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लड़की

माँ मुझे आने दो इस भू पर माँ तुम समझती हो पीड़ा लड़की हूँ पाप नहीं तेरे रक्त से निर्मित मेरा डीएनए नहीं दूँगी दुख-दर्द  भार नहीं बनूँगी बचालो मुझे किसी विध स्त्री के दुश्मन से तू नहीं चाहती मैं खेलूँ तेरी गोद में नाचू आँगन में मुझे मत मरो कोख में मुझे जन्म दो आने दो अपने जीवन में हँसना चाहती हूँ आँचल के नीचे सिक्त छांव में (11/9/2013,दिल्ली) मुन्ना साह  

मोर पंख

सिर मुकुट सजा मोर पंख श्याम सांवरे का मेघ वर्ण प्रिय लता कुञ्ज बंसीधर राधा ध्वनि गूंजे वृन्दावन पवित्रता का प्रतीक पंख आदिवासी  का आभूषण अंश मेघा छाये घनघोर मोर थिरक-थिरक नाचे पंख फैलाये चहुंओर प्रिय बरसाए प्रेम बारिश राधा-कृष्ण चितचोर तुलसी वाल्मीकि कालीदास महाभारत के रचनाकार कर धरे मोर पंख वेदव्यास।                                  (२७/८/२०१३ ,दिल्ली ) मुन्ना साह 

मित्र की मूँछे

मूँछे  रावण की हो यमराज की डरावनी मूँछे पुरुष सत्ता की पहचान मूँछे छोटी पतली मोटी चौड़ी -लम्बी मूँछे नए फैशन में नए रंग की मूँछे काली सफ़ेद सुनहली मूँछे वो सुन्दर-सी मूँछे मुख की शोभा बढ़ा  रही थी जिसे देख पुस्तक मेले में हँसी एक लड़की मैं भी हँसा सब हँसने लगे मेरे मित्र अपनी मूँछ अँगुलियों से सहला रहे थे मित्र की मूँछे   देखकर कोई भयभीत नहीं था पर किसी को प्यार आ रहा था।         (२४/८/२०१३ ,दिल्ली )           मुन्ना साह ,शोधार्थी ,दिल्ली विश्वविद्यालय ,दिल्ली-७

स्वतन्त्रता की भेंट

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 गुलदस्ता करूँ मैं भेंट आज का दिन सुहाना-सा है जम्मू से कन्याकुमारी गुजरात  से अरुणांचल तक का  हर फूल सजाया है हृदय की महक धर्मों की भाषा त्यौहारों,रीति-रिवाजों रंग रूपों का आवरण अकूत खजाना - सा है प्रेम के धागे में इन फूलों को सजाना-सा है आज स्वतंत्रता दिवस है गुलदस्ता करूँ मैं भेंट आपको - आज का दिन सुहाना सा है.        (१५ /८ /२०१३ ,दिल्ली )   मुन्ना साह                                                                                                                                                                  ...

पीड़ा की अभिव्यक्ति

दर्द है सभी में  जुबां  है बंद  आँखों में पानी है  पर हंसी का आवरण  निगल रहा है पीड़ा को  नहीं उसके अभिव्यक्ति को  यह कैसी पीड़ा है ? धर्म अर्थ काम की  तन मन या अपमान की  आभास अनंत है  फिर मुख क्यों मौन है ? किसी के आने का इंतजार है  या किसी के चले जाने का  शब्द नहीं है या जुबान  शायद भाषा का ज्ञान नहीं है  फिर तो हर तरफ अंधकार है  अभिव्यक्ति सुख की हो  चाहे हो पीड़ा की  सभी महसूस करते हैं अभिव्यक्ति  भाषा की और मुख की।           (१८ /१/२०१३ ,दिल्ली )           

हमें चाहिए आज़ादी

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आजादी ये आजादी हमें चाहिए आजादी  खद्दर पहने अन्नाजी  मांग रहे हैं आजादी  खाप पंचायत अभिशाप है  हरियाणा की कुमारियाँ  मांग रही हैं आजादी  विंध्य क्षेत्र की जनजातियाँ  कोल कंगाल बनी हैं  पत्थर तोड़ पेट पालते  इलाहाबाद शंकरगढ़ के  बंधुआ मजदूरों की मांग   हमें चाहिए आजादी  घूँघट में छुपी  परदे से ढँकी  बारह बरस की  ललमुनिया मांग रही  पढने-लिखने की आजादी   हमें चाहिए आजादी।        (१४ /८/३०१३ ,नई दिल्ली )           मुन्ना साह                                            शोध अध्येता ,हिंदी विभाग                                        दिल्ली विश्वविद्यालय ,दिल्ली -७  

पावस गमन

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एहसास शरद  का नित नूतन देखा तुमने मारुत ओ नयन ! हल्की -हल्की  किरणें कुछ धूल उड़ती हुई स्मृति भी- धुंधली-धुंधली सी अंतर मन औंघाई की तुम विघ्न न बनो ओ ठिठरन पावस की खग ने पंख खुजलाई बारिश जोरों की आई नहीं रहा नीड़ नहीं रहा वाह - वाह पावस तुमने भी रंग जमाई।             (१३/१०/२०११ , नई दिल्ली )        मुन्ना साह                                  शोध अध्येता ,दिल्ली विश्वविद्यालय ,दिल्ली -७                                                     चलभाष :८८८२५१११६७